हीरोज vs विलेंस

हीरोज vs  विलेंस 


आज कल एक चर्चा का विषय बन हुआ  है हर जगह वो हीरोज या विलेन्स। जानते तो हम सब है की इन बातो में कितनी सच्चाई है और क्या सच है और कितना सच है पर फिर हमें उन सारी  बातो के लिए कोई सच कहने वाला चाहिए। वो  कहेगा  तब तो सच होगा। 

आइए आप को हम बताते है पहले की आखिर जिस बुरहान मुज़फ्फर वनी के लिए  इतना कुछ हो रहा है  वो है कौन? बुरहान वनी का पूरा नाम  बुरहान मुज़फ्फर अहमद वानी है, उसके पिता एक उच्च माध्यमिक स्कूल के प्रिंसिपल है वनी पुलवामा, जम्मू और कश्मीर के त्राल क्षेत्र के Dadsara गांव में पैदा हुआ था। उसने १६  अक्टूबर 2010 को अपने घर से भाग गया  और 15 साल कीकाम  उम्र में ही उसने अलगाववादी आतंकवादी समूह में शामिल हो गया। उसके सोशल  मीडिया पर अपनी  लोकप्रियता के कारण 2011 में हिजबुल मुजाहिदीन द्वारा सदस्य बनाया लिया गया था। उनके बड़े भाई खालिद मुजफ्फर वानी 13 अप्रैल,, 2015 को भारतीय सेना ने मार डाला था  जब वह अपने भाई से मिलने के लिए अपने  तीन दोस्तों के साथ चला गया था। सेना ने दावा किया है कि खालिद एक आतंकवादी हमदर्द जो अपने दोस्तों के लिए उन्हें भर्ती करने के लिए ले गया था और सुरक्षा बलों ने एक मुठभेड़ में मारा गया था। खालिद के तीन दोस्तों को सेना द्वारा गिरफ्तार किया गया था। जम्मू-कश्मीर पुलिस ने इस बात की पुष्टि या इनकार नहीं  करते हैं कि क्या वह और उसके दोस्त आतंकवादी  गति विधियों  में शामिल हुए थे या नहीं। उसके अपने पिता और अपने घर गांव के निवासियों ने उस को खारिज कर दिया है कि वह एक आतंकवादी था, उनका का दावा है कि उसके शरीर के किसी भी गोली के घाव सहन नहीं किया था और वह अत्याचार किया गया था क्योंकि वह एक आतंकवादी का भाई था। भारत सरकार ने बुरहान क ऊपर  1 लाख रुपये का इनाम रखा बुरहान को खोजने के लिए। उसने सोशल मीडिया का इस्तेमाल वहा के लोगो से अपनी बात कहने के लिए करता था कई वीडियो पोस्ट करने के लिए जाना जाता था। अपने वीडियो में से एक में उसने  युवाओं से अपील की हिजबुल मुजाहिदीन में शामिल होने के लिए और दक्षिण कश्मीर से कम से कम 30 जवान लड़कों की भर्ती की है करने के लिए माना जाता है ।  जून 2016 में जारी एक वीडियो में उन्होंने अमरनाथ तीर्थयात्रियों है कि वे आतंकवादियों ने हमला नहीं किया जाएगा आश्वासन दिया। इसके अलावा, वह भी अपने विश्वास है कि यह घाटी की जनसांख्यिकी को बदलने के लिए एक प्रयास था क्योंकि सैनिक कालोनियों पर हमला करने की धमकी दी। उन्होंने यह भी कश्मीरी पंडितों के लिए sepearate कालोनियों कह रही है कि वे अपनी ही जमीन पर लाइव आ सकता है, लेकिन एक "इसराइल की तरह" स्थिति कश्मीर में अनुमति नहीं दी जाएगी विरोध किया। उन्होंने धमकी दी है कि अधिक हमले "वर्दी में पुरुषों 'के खिलाफ जगह ले जाएगा और यह भी अपने रास्ते से बाहर रहने के लिए राज्य की पुलिस को चेतावनी दी है।

बुरहान दो अन्य सेनानियों बाद में सरताज अहमद शेख और परवेज अहमद लश्करी के रूप में पहचान के साथ 8 जुलाई, 2016 को एक मुठभेड़ में मारा गया था। वह और उसके साथियों जम्मू के स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप-कश्मीर पुलिस और 19 राष्ट्रीय राइफल्स द्वारा कब्जा किए जाने के बाद कोकरनाग के Bundoora गांव में मारे गए थे, एक संयुक्त टीम द्वारा। आपरेशन के दौरान सुरक्षा बलों ने स्थानीय लोगों ने पथराव करने के लिए सहारा से प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। मुठभेड़ 4:30 बजे शुरू हुआ और 6:15 p.m. तक का आतंकवादियों आपरेशन के दौरान एक घर में छिपे हुए थे पर समाप्त हो गया और सैनिकों को तलाशी अभियान के संचालन पर फायरिंग शुरू कर दी। तीनों आगामी मुठभेड़ में मारे गए थे। जम्मू-कश्मीर पुलिस के महानिदेशक लालकृष्ण राजेंद्र पुष्टि की है कि बुरहान सुरक्षा कर्मियों और आतंकवादियों के बीच गोलीबारी में मारा गया।




अब हमारे हम दर्द मीडिया वाले क्या कहते है इस बारे में वो जानते है इन लोगों द्वारा ऐसे हुई आतंकी बुरहान को राष्ट्रीय ‘हीरो’ बनाने की कोशिश


11 जुलाई 2016 – आतंकवादी बुरहान वानी के समर्थन में मीडिया का एक तबका जिस तरह से खुलकर सामने आया है वो बिल्कुल भी हैरानी में डालने वाला नहीं है। देश के तमाम दिग्गज पत्रकारों और तथाकथित बड़े अंग्रेजी अखबारों ने जिस तरह से एक आतंकवादी के लिए हमदर्दी जताई और उसे हीरो साबित करने की कोशिश की उससे लोगों के मन में यह बात घर करने लगी है कि दाल में कुछ न कुछ काला तो जरूर है। हम उन पत्रकारों और अखबारों की लिस्ट लेकर आए हैं बुरहान वानी की मौत के बाद से मातम मना रहे है।



1. इंडियन एक्सप्रेस



कभी निडर पत्रकारिता के लिए पहचाना जाने वाला इंडियन एक्सप्रेस अखबार इन दिनों मानो देशविरोधी ताकतों का अड्डा बना हुआ है। इस अखबार ने अपने फेसबुक कवर पेज पर बुरहान की यह फोटो पोस्ट की। जाहिर है यह फोटो बुरहान के लिए सम्मान में लगाई गई। सवाल यह है कि भले ही एक आतंकवादी के समर्थन में इतने लोग जुटे हों, क्या मीडिया की कोई जिम्मेदारी नहीं है?
इससे पहले भी जब याकूब मेमन को फांसी दी गई थी तो इस अखबार ने हेडलाइन छापी थी कि “And They Hanged Yakub”, मतलब उन्होंने याकूब को फांसी दे दी। इस हेडलाइन को पढ़कर ऐसा लगता है मानो यह किसी पाकिस्तानी अखबार में छपा हो। सवाल यह है कि इसमें किसे “They” कहा गया है? क्या इंडियन एक्सप्रेस इस देश का अखबार नहीं है?

2. राजदीप सरदेसाई



बुरहान को मार गिराए जाने के फौरन बाद ही ये बेचैन हो उठे थे। उन्होंने बुरहान के नाम पर ट्विटर पर मानो झड़ी सी लगा दी। यहां तक तो ठीक था, लेकिन एक ट्वीट में उन्होंने बुरहान की तुलना शहीद भगत सिंह से कर डाली। आगे-पीछे उन्होंने बहुत कुछ ऐसा लिखने की कोशिश की, जिससे साबित हो सके कि वो एक आतंकवादी की वकालत नहीं कर रहे, लेकिन सच छिपाना आसान नहीं होता। सवाल यह है कि एक आतंकवादी की तुलना भगत सिंह से करके क्या साबित करने की कोशिश वो कर रहे हैं?

3. बरखा दत्त



अपनी प्रतिक्रिया में इन्होंने बैलेंस बनाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन चालाकी पकड़ में आ ही जाती है। पहले ट्वीट में ही बरखा दत्त ने बुरहान वानी को स्कूल हेडमास्टर का बेटा बताया। सोशल मीडिया पर लोगों को यह समझते देर नहीं लगी कि देश की ये तथाकथित बड़ी पत्रकार एक आतंकवादी के लिए मन में सॉफ्ट फीलिंग रखती हैं। बुरहान के पिता का एक इंटव्यू भी सामने आया है, जिसमें वो कह रहा है कि उसका बेटा जो कर रहा है बिल्कुल ठीक कर रहा है। जिस पिता का जिक्र करके बरखा दत्त ने सहानुभूति पैदा करने की कोशिश की वो खुद ही एक कट्टरपंथी है, जो कहता है कि बेटा बाद में, इस्लाम पहले। सवाल यह है कि एक आतंकवादी को हेडमास्टर का बेटा बताकर वो क्या साबित करना चाहती थीं?

4. हिंदुस्तान टाइम्स




कांग्रेस पार्टी का करीबी माने जाने वाला यह अखबार बुरहान केस में शुरू से ही एक खास लाइन लेकर चल रहा है। उमर अब्दुल्ला ने कश्मीर में हिंसा की आशंका जताकर पहले ही आग में घी डालने का काम किया था। इस अखबार ने ट्विटर पर बाकायदा पोल करवाया कि “क्या बुरहान की मौत से कश्मीर में माहौल खराब होगा?” सवाल यह है कि क्या किसी आतंकवादी को सिर्फ इसलिए न मारा जाए, क्योंकि उससे माहौल खराब हो जाएगा?

5. राहुल कंवल




इन्होंने एक बचकाना सा ट्वीट किया कि बेरोजगारी की वजह से कश्मीर में बुरहान जैसे लोग आतंकवादी बन जाते हैं। अगर बेरोजगारी की बात करें तो देश में कई दूसरे राज्यों के हालात कश्मीर से भी बुरे हैं। क्या उन जगहों के नौजवान हथियार उठा लेते हैं? इस सवाल का जवाब शायद राहुल कंवल को नहीं सूझा और उन्होंने चुप रहना ही बेहतर समझा। खैर इस बेवकूफी भरी राय के लिए सोशल मीडिया पर राहुल कंवल हंसी का पात्र बने रहे।

6. विक्रम चंद्रा


एनडीटीवी के विक्रम चंद्रा ने तो बुरहान वानी को बेकसूर ठहराने की कोशिश की। सवाल यह है कि जो आतंकवादी कश्मीर घाटी का मोस्ट वांटेड बन चुका हो, जिसके सिर पर 10 लाख का ईनाम हो। उसे मासूम ठहराने की यह कोशिश क्यों की जा रही है। नीचे आप देख सकते हैं कि कैसे विक्रम चंद्रा ने यह जताने की कोशिश की कि उसने कोई आतंकवादी हमला नहीं किया।


ऐसा नहीं है कि सिर्फ इन्हीं पत्रकारों को बुरहान वानी पर प्यार आया है। कई और पत्रकारों ने खुलकर एक आतंकवादी के पक्ष में ट्वीट किया है। ट्विटर पर थोड़े-बहुत लोग उन्हें जवाब देकर अपना गुस्सा कम कर लेते हैं। लेकिन सवाल है कि देश के लोग आखिर कब तक ऐसे पत्रकारों को बर्दाश्त करते रहेंगे जो उन आतंकवादियों के लिए हमदर्दी रखते हैं जो दूसरों की जान लेते हैं।




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